"सब व्यर्थ, यहीं रह जाना है "
डा0 निधि श्रीवास्तव "सरोद"
ग़ज़ल- क़ाबिल तेरे नहीं हूँ मुझे ध्यान आ गया
ग़ज़ल ..''ज़िंदगी तुझे गुरूर क्यों है..''
पास जो पैसे नहीं तो, कौन किसका यार
सोचता था लिखूँ तुझको उन्वान कर
चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’
ग़ज़ल ..'''.....अक़्स बूंदों में दिखाते हैं..''
गीतिका- जिसने खुद को है पहचाना
हर सुबह को आता है नींद से जगा देना
लाल माँ का यूँ ही मारा जायेगा
बलिदान शहीदों का बेकार नहीं होगा
हैवानों के देश में ,विष की फलती बेल
क्यूँ हम वीरों की शहादत भूल जाते हैं?