*पुस्तक समीक्षा*
पुस्तक समीक्षा
पुस्तक का नाम: थिऑसोफी का परिचय
लेखक: उमा शंकर पांडेय (अध्यक्ष उत्तर प्रदेश तथा उत्तराखंड फेडरेशन, थियोसोफिकल सोसायटी)
प्रकाशक: इंडियन बुक शॉप थियोसोफिकल सोसायटी,
कमच्छा, वाराणसी 221010
प्रथम संस्करण: 2025
मूल्य: ₹30
कुल पृष्ठ संख्या: 24
समीक्षक: रवि प्रकाश
बाजार सर्राफा (निकट मिस्टन गंज), रामपुर, उत्तर प्रदेश
मोबाइल 999 7615451
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थिऑसोफी के संबंध में सर्वसाधारण ही नहीं अपितु थिऑसोफी परिवार में दशकों से सक्रिय रहे बंधु भी थिऑसोफी का परिचय जानने के इच्छुक रहते हैं। उमा शंकर पांडेय ने ‘थिऑसोफी का परिचय’ नामक पुस्तक लिखकर इस अभाव की पूर्ति कर दी। पुस्तक की विशेषता मात्र चौबीस प्रष्ठों में गागर में सागर भर देने के कारण हो पाई है। पुस्तक प्रमाणिक है। न केवल इसलिए कि यह थियोसोफिकल सोसायटी के अंतरराष्ट्रीय वक्ता द्वारा लिखित है, न केवल इसलिए कि यह उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड फेडरेशन के वर्तमान अध्यक्ष ने लिखी है, बल्कि इसलिए कि इस पुस्तक के लिखने में जो दस पुस्तकों की संदर्भ सूची दी गई है; उनका पढ़ना और उनके आधार पर पुस्तक तैयार करना एक कठिन काम है।
सर्वप्रथम थिऑसोफी शब्द का अर्थ लेखक ने दिया है। ‘थिऑस’ का अर्थ देव अथवा भगवान है। सोफिया का अर्थ प्रज्ञा। अर्थात दिव्य प्रज्ञा से थिऑसोफी का संबंध है। लेखक ने थिऑसोफी को युगों से संग्रहित-संचित ज्ञान बताया है। यह भी कहा है कि अनंत को इंद्रियों से जाना नहीं जा सकता लेकिन फिर भी समाधि के परमानंद में उस दिव्य सार को समझ सकते हैं। इस कार्य में भोजन और पेय के संयम के साथ-साथ मन की शुद्धि को भी थिऑसोफी में आवश्यक बताया गया है।
एक अच्छी बात लेखक ने यह लिखी है कि थिऑसोफी में हम जो कुछ भी उच्च स्तर पर कहते हुए पाते हैं, वह कोई आदेश अथवा अंधविश्वास के रूप में ग्रहण करने योग्य नहीं है; बल्कि स्वयं परीक्षण करने की आवश्यकता है। पुस्तक का मानना है कि थिऑसोफी ज्ञान की खोज की सतत प्रक्रिया है। परम सत्य के चेहरे से पर्दा इसमें धीरे-धीरे हटता है। पुस्तक के लेखक ने दिव्य ज्ञान अर्थात थिऑसोफी को सभी धार्मिक शिक्षाओं के मूल की जांच करने वाला बताया है।
थिऑसोफी की व्यवहारिक परिभाषा के लिए लेखक ने मैडम ब्लैवेट्स्की को उद्धृत किया है। लिखा है:
“हमारी विनम्र राय में मानवता के धर्म में एकमात्र अनिवार्य चीज हैं: सदाचार, नैतिकता, भाईचारे का प्रेम और हर जीवित प्राणी के प्रति दयालु सहानुभूति” (पृष्ठ 16)
पुस्तक में बताया गया है कि थिऑसोफी का मानना है कि पृथ्वी पर मानव विकास की प्रक्रिया पूर्ण करने वाले मनुष्यों का एक सिद्ध संघ होता है। यह सिद्ध संघ मानवता को समय-समय पर सही दिशा देता है।
पुस्तक के अनुसार थिऑसोफी के तीन महान सत्य हैं, जिसमें यह बताया गया है कि जीवात्मा अमर है। उसके विकास और वैभव की अनंत सीमाएं हैं। जीवनदाई तत्व इंद्रियों से देखा छुआ नहीं जा सकता। लेकिन फिर भी जो इसे अनुभव करना चाहते हैं, वह अनुभव कर सकते हैं। तीसरा यह कि मनुष्य अपना भाग्य विधाता स्वयं है।
पुस्तक में थिऑसोफी की सार्वभौमिक प्रार्थना भी दी गई है। यह इस प्रकार है कि एक गुप्त जीवन प्रत्येक परमाणु, प्रत्येक प्राणी में विद्यमान है। इसके साथ एकत्व का अनुभव ही सर्वोच्च अनुभव है ।
थियोसोफिकल सोसायटी के उद्देश्य पुस्तक में इस प्रकार बताए गए हैं कि सब प्रकार के भेदभाव से रहित मानवता की स्थापना, तुलनात्मक धर्म दर्शन और विज्ञान का अध्ययन तथा प्रकृति के और मनुष्य के गुप्त रहस्यों की खोज करना।
आशा की जानी चाहिए कि जो बंधु थिऑसोफी के परिचय के आकांक्षी हैं, उनकी पिपासा को यह पुस्तक तृप्त कर सकेगी। लेखक को बधाई।