द्रौपदी की व्यथा
इतिहास भुला ना पायेगा
पांडवों का गौरव गाएगा
दी लगा दांव पर पत्नी ही
इस पर नहीं कौन लजाएगा..
क्या शब्द सोचने पड़ते हैं
क्या शब्द तोलने पड़ते हैं
कुछ कहने को दुर्जन को भी
क्या शब्द खोजने पड़ते हैं…
हां,,हृदय उसका चित्कारा था
सबको ही उसने पुकारा था
जब लगा था होने चीर हरण
किस-किस को नहीं गुहारा था…
सब बैठे थे क्यों जड़ होकर
सब वीर रहे रज कण होकर
रचना यह महाभारत की थी
अब रहेगा निश्चित रण होकर…
सब ने ली अपनी आंखें झुका
क्या पांडव और गुरूजन क्या
क्या श्वसुर और क्या भीष्म पिता
क्या प्रजा और सभाजन क्या..
बस बिलख बिलख कर ही रोती
सब मान अपना पल में खोती
क्या होता पुकार द्रौपदी की
केशव ने जो न सुनी होती..
जब उन्हें हृदय से बुलाते हैं
वे दौड़े दौड़े आते हैं
द्रौपदी ही क्या, सब भक्तों की
बनवारी लाज बचाते हैं….
क्रमशः..