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20 Mar 2025 · 1 min read

कवि

कवि
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कवि बनना सरल नहीं है
कलम कॅंपकपाती है
मन छटपटाता है
आत्मविश्वास लड़खड़ाता है
रातों की नींद चली जाती है
तब कोई कवि बन पाता है…।

जमाने भर की व्यथा सहनी पड़ती है
सदियों शब्द साधना करनी पड़ती है
संसार का सुख-दुःख सहना पड़ता है
सौ बात की एक बात पागल होना पड़ता है
तब कोई कवि बन पाता है…।

जब जग हंसता है तब रोना पड़ता है
मन चाहे पुष्पों को छोड़, कांटों को चुनना पड़ता है
पग -पग पर संग्राम महान करना पड़ता है
हृदय होता है छलनी और सृजन करना पड़ता है
तब कोई कवि बन पाता है…।

– मुकेश कुमार ऋषि वर्मा
ग्राम रिहावली, डाक घर तारौली गूजर, फतेहाबाद, आगरा, उत्तर प्रदेश 283111

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