धरा विभव
///धरा विभव///
तुम ही वह मृदु मंजुल मुस्कान,
जहां प्रेम की लहरें उठ आती हैं।
तुम ही हो इस जगती के प्राण,
जहां मलय पवन बहती जाती हैं।।
प्राणायन जगती का अंबर से,
शून्य जगत के महती विहान।
क्या? जगत भुवन जगती अंबर,
सलिल निधि भी आश्रय पाती है।।
करुण दृगों से झरता उन्मन,
यहां प्रणय की बात नहीं।
विहंसी विरुदा अंगारों पर,
विरही श्वासें निजता पाती है।।
करती क्या कलरव मुस्कानें,
उनका स्वर नीरव होता है ।
प्राण पयोनिधि जगत वपु तुम,
तुम्हें नित्य निनादित पाता है।।
जगती के आंचल के प्रसून तुम,
अश्रु कणों के वह भाव करूण।
छा जावें वह हृदय अंचल में,
धरा अन्तर की प्रभा अरुण।।
कहती ताल तरंगे जल से,
आशाओं का हम पर आरोपण।
क्षण क्षण गिरते उठते हैं,
इन आशाओं के उलझे मन।।
तेरा प्रणय मिलन उन्मन,
खो जाता है झंझा वातों में।
उर आशा न संजो पायी,
तेरी उलझी चंचल बातों में।।
चिर भिक्षा पात्री स्पंदन की,
प्रेरित प्रेरण प्रमुदित संभव।
करो आज न झंकृत इनको,
रहने दो ऐसे निर्जन नीरव।।
न मुस्काने हैं न है कोई रव,
जग तब केवल चंचल शव।
समाऊं मैं अनंत विपिन में,
सुतल धरा के अतुल विभव।।
स्वरचित मौलिक रचना
प्रो. रवींद्र सोनवाने ‘रजकण’
बालाघाट (मध्य प्रदेश)