*ये रिश्ता क्या कहलाता है*

डॉ अरूण कुमार शास्त्री एक अबोध बालक अरूण अतृप्त
प्रेमी और प्रेमिकाओं का चौदह से चालीस के
बाद क्यों कोई नाम नहीं होता।
उनका कोई चेहरा तो होता है , बहुत प्यारा ,
वो होते हैं विषम परिस्थितियों में डूबते तिनके का सहारा।
लेकिन सामाजिक लोकाचार में नहीं लिया जाता उनका
नाम।
और न ही सार्वजानिक रूप से जाता इनको पुकारा।
पीछे से जाके कर ली जाती है प्यारी सी झप्पी और जाता है प्यार से पुचकारा।
इनके कंधे पर लिया जाता है सहारा ये आधार होते हैं सभी विषम परिस्थितियों के जैसे बैंक बैलेंस ऍफ़ डी मुश्किल घड़ी का सहारा
इनसे की जा सकती हैं सभी प्रकार की बातें ,
अच्छी भी बुरी भी ओछी हरकतें दिल खोल के ,
खिलखिलाया जाता है इनके साथ बिना परवाह के बिना चिंता के बिना हिचकिचाहट के बेशर्मी से बैखौफ।
दी जा सकती हैं बद्तमीजी वाली गालियां बिना सोचे बिना समझे।
वो होते हैं विषम परिस्थितियों में डूबते तिनके का सहारा।
लेकिन सामाजिक लोकाचार में नहीं लिया जाता उनका
नाम।
और न ही सार्वजानिक रूप से जाता इनको पुकारा।
पीछे से जाके कर ली जाती है प्यारी सी झप्पी और जाता है प्यार से पुचकारा।
रो सकते हैं इनके सामने , एक बच्चे के जैसे ,
मचल सकते हैं कट्टी कर सकते है हजार बार फिर सोर्री कहे बिना अब्बा करने में नहीं होता दर्द , फ़र्ज़ और न ही कोई फिकर।
न करता कोई बार – बार इन हालात का तफसरा और न ही होती बहस न कोई जिकर।
संसार के सबसे सूंदर रिश्ते कहलाते हैं ये बस खुल के सभी से इनके बारे में हम लोग नहीं बतलाते हैं।
वो होते हैं विषम परिस्थितियों में डूबते तिनके का सहारा।
लेकिन सामाजिक लोकाचार में नहीं लिया जाता उनका
नाम।
और न ही सार्वजानिक रूप से जाता इनको पुकारा।
पीछे से जाके कर ली जाती है प्यारी सी झप्पी और जाता है प्यार से पुचकारा।
बहुत से सुसाइड बचा लेते हैं ये रिश्ते , बहुत सारे अश्क़ पी जाते हैं।
मानसिक तकलीफों का इनको चिकित्सक कहा जाता मगर माना कहाँ जाता।
इन रिश्तों की सबसे बड़ी बात इनमें उम्र होती है दरकिनार।
रूप रंग शक़्ल सूरत का नहीं होता सरोकार।
इज्ज़त होती है एक रुतबा होता है अधिकांश पैसे से नहीं तोला जाता ये रिश्ता।
बस एक ही होता है अनुबंध हर हाल में बन जाता है जो सहारा।
जैसे खाटू श्याम बाबा प्यारा प्यारा , हारे का सहारा।
ये शिक्षित करते हैं एक दुसरे को तकनीकी और पुस्तकीय रूप से निस्वार्थ सुख आनंद मिलता , ये दिलाते आत्मसम्मान , भरोसा चुपचाप।
बिना अहसान बिना ताना जिनका नहीं होता कोई अवकाश न ही कोई सर्दी गर्मी और बरसात।
वो होते हैं विषम परिस्थितियों में डूबते तिनके का सहारा।
लेकिन सामाजिक लोकाचार में नहीं लिया जाता उनका
नाम।
और न ही सार्वजानिक रूप से जाता इनको पुकारा।
पीछे से जाके कर ली जाती है प्यारी सी झप्पी और जाता है प्यार से पुचकारा।