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4 Mar 2025 · 1 min read

* कोई इतना बिख़र गया कैसे

* कोई इतना बिख़र गया कैसे
वक़्त गुज़रा गुज़र गया कैसे

* आज भी इंतजार है उसका
वक़्त जो लौटकर नहीं आया

☆ लम्हा लम्हा जिया है शिद्दत से
वक़्त हमने कहां गवाया है

☆ कितनी सदियों को इसने काटा है
वक़्त को क्या थकन नहीं होती

☆ वक्त ने खो दिया जिसे शायद
अपनी तस्वीर देख कर रोये

* एक सा कुछ कभी नहीं रहता
वक्त तब्दीलियां भी लाता है

☆ छीन लेता है साथ अपनों का
वक़्त वो बेरहम लुटेरा है

* वक़्त के साथ सब बदलता है.
तअज्जुब हमको अब नहीं होता
डाॅ फ़ौज़िया नसीम शाद

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