कैसे गीत लिखूँ , बोलो तुम कैसे गीत लिखूँ
कैसे गीत लिखूँ , बोलो तुम
कैसे गीत लिखूँ
एक तुम्हीं थे जिसे देखकर
ख़्वाब मेरे जगते थे
एक तुम्हीं थे जिसे सोचकर
काँटे फूल लगते थे
एक तुम्हारे होने भर से जग
अपना सा होता था
एक झलक पा जाने को मैं
शीशा सा होता था
तेरे सामने आने से पहले
सजता और संवरता था
तुम्हें सुनाने हेतू मैं
गीत का रचना करता था
तुम्हें अपने गीतों का मैं
उन्वान कहा करता था
तुम्हें शास्त्र और खुद को मैं
ज्ञान कहा करता था
अब किसको घर की दीवारें
किसको भीत लिखूँ
कैसे गीत लिखूँ , बोलो तुम
कैसे गीत लिखूँ
तुमसे मिलने के खातिर हर
दूरी तय करता था
हर मुश्किल से लड़ जाता मैं
औ ‘ पल – पल मरता था
तुम्हें देखकर ब्लैक शूट में
आह निकलती थी
मेरे भोले – मीठे स्वर से
चाह निकलती थी
जान बूझ कर मैं मसखरे सा
हरकत करता था
तुम्हें हँसाने के लिए ही तो
हरेक शरारत करता था
कैसे भूल गई तुम मुझको
प्रिये ज़रा तो बोलो
आओ ना अब लौट मुसाफिर
मुधुरस फिर तुम घोलो
किसके आखों के जूठे
शरबत बोलो चखूँ
कैसे गीत लिखूँ , बोलो तुम
कैसे गीत लिखूँ
तुझसे लिखे गीत अब मुझको
रूठे लगते हैं
तेरे साथ बिताए वो लम्हें
अनूठे लगते हैं
गीतों के हर हर्फ तुम्हें
आवाज लगाते हैं
मेरे कंधे अब भी तेरे
नाज उठाते हैं
ऐसा ना हो तेरे इंतजार में
जनाज़ा मेरा उठ जाए
केवल हों अंधी काली रातें
और सवेरा उठ जाए
ऐसा हो जाने से पहले
आ जाओ इन बाहों में
हम दोनों हैं इक दूजे के
क्यूँ पड़ती अफवाहों में
दुनिया को तो चाहिए मुद्दा
नहीं तो मुर्दा होगी
इस दुनिया को ख़ुद ही न पता
कब ये क्या – क्या होगी
दुनिया से तो हार चुका मैं
क्या तुमको जीत लिखूँ
कैसे गीत लिखूँ , बोलो तुम
कैसे गीत लिखूँ