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12 Oct 2024 · 2 min read

*दशहरे पर नए बहीखातों के पूजन की परंपरा*

दशहरे पर नए बहीखातों के पूजन की परंपरा
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हमारे परिवार में दशहरे का हमेशा से विशेष महत्व रहा है। इस दिन नए बहीखातों का पूजन होता था। पूजन के अंतर्गत बहीखातों के प्रथम पृष्ठ पर रोली से स्वास्तिक बनाया जाता था। बहीखातों से अभिप्राय लाल कपड़े की जिल्द वाले ‘डबल फोल्ड’ के बहीखातों से है। उन दिनों दुकान पर चॉंदनी बिछाकर सब लोग बैठते थे। ग्राहक भी और दुकानदार भी। डबल फोल्ड का बहीखाता जब खोला जाता था, तो काफी जगह घेरता था। जमीन पर बैठकर ही उस पर काम करने में सुविधा होती थी।

पूजन के बाद नए बहीखातों पर दुकान का काम शुरू हो जाता था। पुराने बहीखातों को नए बहीखातों पर उतारा जाता था।

सारा काम मुंडी लिपि में होता था। जब 1984 में मुनीम जी (पंडित प्रकाश चंद्र जी) जिनको हम आदर पूर्वक ‘पंडित जी’ कहते थे, का देहांत हो गया; तब पिताजी ने मुंडी लिपि के स्थान पर बहीखाते के काम में देवनागरी लिपि अपना ली। पहले साल का बहीखाता उन्होंने उतारा। इसमें कितना परिश्रम लगा होगा, इसका अनुमान मुझे तब लगा; जब अगले साल मैंने बहीखाता उतारा। मुझे पंद्रह दिन लगे। पिताजी का कहना था कि पंडित जी दशहरे से शुरू करके लगभग गंगा स्नान से कुछ पहले तक बहीखाता पूरा कर पाते थे।

जब 1985-86 के आसपास पूरे देश में वित्तीय वर्ष 1 अप्रैल से 31 मार्च लागू हो गया, तब कुछ वर्ष तक तो बहीखातों के पूजन की औपचारिकता चलती रही, लेकिन फिर उसके बाद बड़े साइज के कागज पर दिनांक सहित सोने-चॉंदी आदि के भाव लिखकर पुरानी परंपरा का निर्वहन होता रहा। यह अब भी चल रहा है।

दशहरे पर बहीखाते पूजने के बाद उनको लेकर हम लोग घर के दरवाजे के बाहर जाते थे तथा एक-दो कदम चलकर फिर वापस लौट आते थे। घर से बाहर बहीखाता लेकर जाने तथा लौटकर आने के पीछे मेरे ख्याल से यह विचार रहा होगा कि पुराने जमाने में बरसात के बाद मौसम अच्छा होने पर व्यापारी लोग लंबी यात्रा पर दशहरे के दिन से प्रस्थान करते रहे होंगे। फिर जब दशहरे पर व्यापार के लिए घर से बाहर लंबी यात्रा पर जाना बंद हो गया होगा, तब परंपरा को प्रतीक रूप से निभाने का कार्य चला होगा।

दशहरे पर दुकान की तराजू और बाटों पर भी कलावा बॉंधा जाता था। कलम पर भी कलावा बॉंधा जाता था। लेखक होने के नाते कलम पर कलावा बॉंधना मुझे दशहरे पर विशेष प्रिय लगता है।

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