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17 Aug 2024 · 1 min read

** सीने पर गहरे घाव हैँ **

** सीने पर गहरे घाव हैँ **
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सीने पर गहरे घाव हैँ,
जीने के खोये चाव हैँ।

दिल में जो थे कब से दबे,
मन से निकले अब भाव हैँ।

बस्ती बदली – बदली लगे,
शहरों के तम में गाँव हैँ।

आँगन में निकली धूप भी,
शीतल बगिया की छाँव है।

जी लो जी भरकर जिन्दगी,
जीवन बाकी कुछ पाव है।

घटते – बढ़ते रहते सदा,
सहते आये हम ताव हैँ।

मनसीरत मन में तो प्रेम है,
नफरत में जलते दाव हैं।
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सुखविंद्र सिंह मनसीरत
खेड़ी राओ वाली (कैंथल)

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