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6 Aug 2024 · 1 min read

दोहा पंचक. . . . . नटखट दोहे

दोहा पंचक. . . . . नटखट दोहे

कुछ शर्मीली शोखियाँ, कुछ मेरे जज्बात ।
आग लगाने आ गई, उस पर यह बरसात ।।

काबू में कैसे रहे, फिर दिल का तूफान ।
भीगे जब बरसात में, ख्वाबी सा अरमान ।।

मुख मयंक पर मेघ की, रास करे बौछार ।
केशों से मुक्ता गिरे, अधर लगें अंगार ।।

करती है बरसात में, नजर बहुत आखेट ।
मारे शरम परिधान को, गौरी रही लपेट ।।

मेघों की अठखेलियाँ, रिमझिम सी बरसात ।
भीगे अधरों से करें, अधर मधुर उत्पात ।।

सुशील सरना / 6-8-24

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