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28 May 2024 · 1 min read

54….बहर-ए-ज़मज़मा मुतदारिक मुसम्मन मुज़ाफ़

54….बहर-ए-ज़मज़मा मुतदारिक मुसम्मन मुज़ाफ़
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन 22 22 22 22 22 22 22 22
दर्द जहाँ मैं टांगा करता, टूटी आज वो खूंटी लगती
सारे संबल सभी आसरे,बिना असर की बूटी लगती

लेकर चलना उसी गली में,यादों का भरता हो मेला
बचपन खेल घरोंदे वाले, नाव डुबाता रहूं अकेला
अब उम्र क़े इस पड़ाव में, कितनी बातें छूटी लगती
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अरमानों के जब पँख नहीं थे, आकाश लगा करता छोटा
उड़ने की जब ताकत आई तब ,व्यवधानो ने रोका टोका
शेष बचा क्या कहने को अब नगीन बिना अंगूठी लगती
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इन बाजुओं का दम तो देखो ,पहले जैसा आज भी क़ायम
तुझसे मिलने की चाहत में ,रत्ती भर उत्साह नहीं कम
अरमानों की दुनियां तुझ बिन खाली – खाली झूठी लगती
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उमंग उजालों सजती सजाती ,सदा रहे पहचान दिवाली
मुस्कान बांटते जाना यूँ,तमाशबीन बजा दे ताली
मंहगाई हर पीठ छोलती , लम्बी विपदा की सूटी लगती
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सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग (छ.ग.)
susyadav7@gmail.com
7000226712
30.3.24.

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