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27 May 2024 · 6 min read

हमारे बुजुर्ग

हमारे बुजुर्ग

परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है। यह हर स्थिति में होना ही है। जैसे- एक वस्तु से दूसरी वस्तु में परिवर्तन, प्रकृति में ऋतुओं का परिवर्तन, युद्ध के बाद शांति में परिवर्तन आदि। उसी प्रकार वृद्ध अवस्था भी परिवर्तन का ही एक हिस्सा है जिसे हम मानव जीवन का चक्र कह सकते हैं। प्रत्येक जीवात्मा जन्म के पश्चात् बाल्यावस्था, किशोरावस्था, युवावस्था एवं वृद्धावस्था से होकर गुजरता ही है। यही जीवन का अटल सत्य है। इसे स्वीकार करने के लिए हमें मानसिक रूप से तैयार रहना चाहिए तभी हम इस अवस्था में खुश और स्वस्थ रह सकते है।

इतिहास गवाह है कि प्राचीन समय में हमारे वृद्धों की स्थिति आज के समय से ज्यादा अधिक सम्माननीय और उत्त्म थी। परिवार और समाज में उनकी एक अलग पहचान होती थी। चाहे परिवार बड़ा हो या छोटा, डोर वृद्धों के हाथ में हुआ करती थी। परिवार में किसी तरह के भी काम-काज वुजुर्गो के सलाह लिए बिना नहीं किया जाता था। परिवार के लोग अपने घर के वुजुर्गो पर विश्वास करते थे। वे जो भी कहेंगे या करेंगे उसमे हम सब की भलाई होगी। हमारे देश की संस्कृति में वृद्धों का स्थान परिवार और समाज में सर्वोच्च था। भारतीय समाज में संयुक्त परिवार की प्रणाली बहुत पुराने समय से ही चली आ रही है। संयुक्त परिवार का कारण भारत की कृषि प्रधान व्यवस्था, अर्थव्यस्था, प्राचीन परम्पराएँ तथा आदर्श आदि भी निहित है। लेकिन जैसे-जैसे समय में परिवर्तन होता जा रहा है वैसे-वैसे हर क्षेत्र में भी परिवर्तन होता जा रहा है।

वृद्धों के समस्या के निम्नलिखित कारण है- 1.संयुक्त परिवार का विघटन 2. भौतिक सुख- सुविधाओं में वृद्धि 3. नई और पुरानी पीढ़ी के बीच भेद 4. शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य की समस्या 5. आर्थिक समस्या और 6. व्यक्तिगत स्वार्थ
संयुक्त परिवार का विघटन- संयुक्त परिवार से तात्पर्य है- परिवार के सभी सदस्य जैसे दाद-दादी, चाचा-चाची, माँ-बाबूजी आदि सभी एक साथ मिल जुलकर एक घर में रहना। बदलते समय के अनुसार आज संयुक्त परिवार कि संख्या कम होती जा रही है। संयुक्त परिवार में सबसे अधिक देख-रेख बच्चों और बुजुर्गो की होती है। युवा वर्ग वृद्धों कि देख–रेख करते हैं और बुजुर्ग बच्चों की, जिससे बच्चों का शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक विकाश पूर्णरूप से होता है। लेकिन आज विडम्बना यह है कि एकांकी और स्वतंत्र जीवन जीने की सोंच ने संयुक्त परिवार की व्यवस्था को अलग-थलग कर दिया है। हमारे वृद्धों की समस्याओं का मुख्य कारण संयुक्त परिवार का विघटन ही है, ऐसा कहा जा सकता है। बदलते समय के साथ आज की पीढ़ी को संयुक्त परिवार में रहना पसंद नहीं है। आज संयुक्त परिवार का चलन कम होता दिखाई दे रहा है। संयुक्त परिवार में हमेशा ही परिवार के प्रत्येक सदस्य का समर्थन होता है। परिवार के सभी सदस्य आपसी मेल-जोल से कार्यों को करते हैं जिससे सभी को खुशी प्राप्त होती है। पारिवारिक समृधि परिवार के सभी सदस्य के जीवन में खुशियाँ देती है। साथ मिलकर रहने की खुशी ही अलग होती है। मनुष्य सामाजिक प्राणी है। यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है।

भौतिक सुख-सुविधाओं में वृद्धि- आज के समय में भौतिक सुख-सुविधाओं का अम्बार है। जिससे लोगों के रहन-सहन एवं जीवन शैली में तेजी से बदलाव आया है। इन्ही भौतिक सुखों कि चाहत में लोग परिवार और समाज से दूर होते जा रहे हैं। व्यक्ति अपने कार्य में इतना व्यस्त हो रहा है कि उन्हें अपने परिवार के साथ बैठने तक का फुर्सत नहीं है। जिसकी सबसे अधिक पीड़ा बुजुर्गों को हो रही है।

नई और पुराणी पीढ़ी के बीच भेद- प्रकृति का नियम है कि जो पैदा होता है उसे नष्ट भी होना है। मनुष्यों के साथ उम्र की जो सीमा है उसे भी प्रकृति ने ही तय किया है। विज्ञान ने भी यह सिद्ध किया है कि पुरानी पीढ़ी से नई पीढ़ी ज्यादा चालाक और बुद्धिमान होती है। नई शिक्षा, संस्कृति, सभ्यता और सामाजिक व्यवस्था से वर्तमान समय की पीढ़ी पिछली पीढ़ी के लोगों से बिल्कुल अलग है। नई विचार धारा और पुराने समय की विचार धारा में जमीन असमान का अंतर हो गया है। जिसके फलस्वरूप दोनों में एक आतंरिक संधर्ष और आपसी खिचातानी चल रही है। जिसे हर घर में देखने को मिल रहा है। इन दोनों पीढियों के समस्याओं को कम करने के लिए पुरानी पीढ़ी को ही आगे आना होगा। पुरानी पीढ़ी में नई पीढ़ीयों कि अपेक्षा अधिक योग्यता, सहनशीलता और परिपक्वता होती है। हमें उनकी छोटी-छोटी बातों को नजर अंदाज करना होगा नहीं तो बच्चे किसी भी कार्य के लिए या किसी भी संबंध में अपने बड़ों से राय लेना छोड़ देंगे। जिससे हो सकता है की वे नेतृत्व के अभाव में कहीं गलत कार्य ना कर लें।

शारीरिक एवं मानसिक स्वाथ्य की समस्या- ये मनुष्य के जीवन का सबसे बहुमूल्य और अंतिम पड़ाव है। इस अवस्था में वृद्ध को अनेक प्रकार के समस्यओं का सामना करना पड़ता है। शारीरिक बदलाव के साथ-साथ मनुष्य में मानसिक बदलाव भी होता है, जिसके कारण बुजुर्ग अपने आप को कमजोर और अकेला महसूस करने लगता है। वैसे ये क्रियाएं सभी वृद्ध के साथ नहीं होता। कुछ व्यक्ति तो 60 वर्ष में भी जवान दिखाई देते है तो कुछ 40 वर्ष में ही वृद्ध दिखाई देने लगते हैं। इस उम्र में ही हमें अपनों की अधिक आवश्यकता होती है लेकिन आज समय की रफ्तार इतनी तेज हो गई है कि सभी अपने आप में व्यस्त हो गये हैं। किसी के पास किसी को बैठने का समय ही नहीं है। मेरी सोंच से सूरज वही है, चाँद वही है, दिन वही है, रात भी वही, समय भी वही 24 घंटे का ही है तो बदला क्या है। सिर्फ सोंच ।

आर्थिक समस्या- प्रत्येक वृद्ध इतना सौभाग्य शाली नहीं होता है कि वह जीवन के अंतिम पड़ाव तक आत्मनिर्भर बना रहे। आर्थिक समस्या भी वृद्धों के लिए मुख्य समस्या है। यह समस्या वृद्धों के लिए सबसे महत्वपूर्ण समस्या है। जो वृद्ध सरकारी नौकरी में होते हैं उन्हें तो आर्थिक परेशानी नहीं होती है क्योंकि उन्हें पेंसन मिलता है। परन्तु सभी वृद्ध सौभाग्यशाली नही है, जो जीवन के अंतिम पड़ाव तक आत्मनिर्भर रहे। अनेक वृद्धों को आर्थिक रूप से अपने परिवार जनों पर आश्रित रहना पड़ता है। जिससे परिवार में उन्हें अनेक बार असहज परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। जीवन की इस अंतिम पड़ाव पर वृद्ध का आत्मनिर्भर होना उनके लम्बे जीवन के लिए वरदान जैसा है। अतः आर्थिक निर्भरता भी वृद्ध लोगों के लिए एक मुख्य समस्या है।

व्यक्तिगत स्वार्थ- आज लोग स्वार्थी हो गए हैं। जिन वृद्धजनों के पास धन-संपति होता है उसे तो धन-संपति के लालच में घर वाले सेवा करते हैं लेकिन जिनके पास धन-संपति नहीं होती है उनकी तो हालत का पूछिए मत। कहने में दुःख होता है। हमारे यहाँ कि एक कहवत है, “आज हमारी कल तुम्हारी देखो भईया पारा-परि”। अथार्त आज हम हैं कल इस जगह तुम होगे।
अतः परिवर्तन तो प्रकृति का नियम है।

जिस तरह डोर से कटी हुई पतंग सहारा ढूंढती है। उसी तरह वृद्ध व्यक्ति भी अपने आप में टूटकर सहारे के आकांक्षी हो जाते हैं। और इस स्थिति में उनको जो सहारा देता है वे उसपर अपना सर्वस्व लुटाकर उसकी अधीनता स्वीकार कर लेते हैं कि वह भी उसके प्रति उसी तरह आभारी बना रहे। जीवन भर कि व्यस्तता बुढ़ापे में आराम और शांति चाहती है। बुजुर्ग की बस एक ही अभिलाषा होती है भर पेट भोजन और सम्मान। आज का समाज जाने अंजाने में विनाश की ओर बढ़ता जा रहा है। इसका मूल कारण कहीं न कहीं नैतिक पतन है।
प्रेमचंद जी ने अपनी कहानियों में यह अहसास दिलाते हुए कहा है कि “बुजुर्ग अपने बच्चों से कई उम्मीद रखते है। अतः आज की युवा पीढ़ी को उनकी उम्मीदों पर खड़ा उतरने का प्रयास करना चाहिए। माता-पिता का ऋण चुकाया तो नहीं जा सकता है किन्तु उसकी सेवा सुश्रुषा कर के ऋण को कुछ कम जरुर किया जा सकता है”। “मनुस्मृति में भी इस बात का प्रमाण मिलता है कि बुजुर्गों का नित्य आशीर्वाद लेने एवं उनकी सेवा करने से आयु, विद्या, यश और बल इन चारों गुणों की वृद्धि होती है”। अतः आज की युवा पीढ़ी को उनका सम्मान करना चाहिए न कि सिर्फ इस्तेमाल।

जय हिंद

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