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27 May 2024 · 1 min read

नारी के मन की पुकार

संस्कृतियों का पाठ पढ़ाना ,

सबको अच्छा लगता है ,

मर्यादा का मान बचाना,

सबको अच्छा लगता है ।।

पुरा काल से चली आ रही ,

हीन दशा उस नारी की ,

जय हो उस समाज की जय हो ,

केंद्र बनी नारी जिसकी ।।

सीता माँ को जब रावण ,

हरकर लंका ले जाता है ,

उनकी होती अग्नि परीक्षा ,

पुरुष परीक्षा नहीं होती ।।

जो आदि शक्ति अविनाशिनि है ,

उनको इस जग ने नहि छोड़ा,

क्या कसूर था उनका इसमें ,

क्यों ऐसा हो जाता है ?

गौतम ऋषि की नारि अहल्या ,

इंद्र से जब छ ली जाती है ,

बेकसूर वो सती अहल्या ,

तब पाहन बन जाती है ।।

लेकिन अब बस बहुत हो चुका ,

अब हमको नही डरना है ,

मर्यादा को ध्यान में रखकर ,

सच के लिए हमें लड़ना है।।

क्या सृष्टि होती इस जग में,

यदि नारी नहीं होती ,

सत्यवान के प्राण क्या बचते,

यदि सती सावित्री नहि होती ।।

इससे ज्यादा और क्या कहूँ ,

नारी का सम्मान करो ,

नारी होती गृह की लक्ष्मी ,

उस पर तुम विश्वास करो ।।

अनामिका तिवारी “अन्नपूर्णा”✍️✍️

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