वो पिता है साहब , वो आंसू पीके रोता है।
पूरी बरसात निकाल दी, बिना छतरी के उसने,
सौ रूपए बचाकर बेटे को चप्पल खरीद लाता है।
और पूरे बीस रूपए बचाता है रिक्शा न लेकर,
चूड़ियां दिलाना है बेटी को , सो पैदल घर जाता है।
पत्नी कुछ नहीं मांगती कभी, ये विचार सताता है,
और अपनी शर्ट के पैसे से, वो साड़ी खरीद लाता है।
इसके बाद भी, कैसे दिखेगी आंखों में नमी उसकी,
वो पिता है साहब, वो जिम्मेदारियों को जीता है।
परिवार को न हो दुख, इसलिए आंसू पीके रोता है।
वो पिता है साहब………………………………….🖊️
बदन पर वही पुरानी शर्ट, गले में पुराना वही गमछा,
पैरों में पुरानी चप्पल हैं, आंख में धागे से बंधा चश्मा।
खर्च बहुत करता है परिवार पर, खुद बस कमाता है,
परिवार तो चमकता है, बस इक वही गरीब लगता है।
न जिंदगी से शिकवा, न किसी और से गिला है उसको,
बेटी की शादी है अभी, बस एक यही चिंता है उसको।
बेटे की फीस भी अभी वाकी है, ये दिन रात सोचता है,
एक नई चिंता में खोता है, और अपना घर बेच देता है।
बेटी की शादी भी चुकी है, बेटा भी अब तो अफसर है,
परिवार भी खुश है अब, बस उसको थोड़ा बुखार है।
बेटे ने शादी कर ली, वो बड़े महल में महल में रहता है,
पिता अपनी पत्नी के साथ अनाथ–आश्रम में रहता है।
अभी भी न आई नमी आंखों में, सब्र तो सब्र होता है,
आखिर वो तो पिता है साहब, वो आंसू पीके रोता है।
वो पिता है साहब…………………………………….✍️
लेखक/कवि
अभिषेक सोनी”अभिमुख”