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25 May 2024 · 3 min read

*राधेश्याम जी की अंटे वाली लेमन*

राधेश्याम जी की अंटे वाली लेमन
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आज दिनांक 25 मई 2024 शनिवार को अनिल कुमार आहूजा जी की हामिद गेट (किले की दीवार), रामपुर स्थित दुकान पर लेमन पीने गया तो अकस्मात प्रश्न पूछ लिया- “अनिल जी! यह अंटे वाली लेमन तो हम बचपन से ही आपकी दुकान पर पीते रहे हैं। कितना पुराना यह हुनर रहा होगा ?”
अनिल कुमार जी के मुख पर हल्की सी मुस्कान तैर गई। कहने लगे- “जब देश आजाद हुआ था, उसके बाद से जब हमारा परिवार रामपुर आया तभी से यह अंटे वाली लेमन हमने रामपुर में शुरू की।”
” तब तो यह रामपुर में अंटे वाली लेमन की सबसे पुरानी दुकान हुई ?”
” जी हां, सबसे पुरानी दुकान हमारी ही है। हमारे साथ ही शायद आपको ध्यान होगा कि किले के गेट से आगे सरदार जी की भी लेमन की दुकान हुआ करती थी।”
हमें बिल्कुल ध्यान आ गया। हमने कहा- “उनकी लेमन भी मशहूर थी। अब काफी समय से नहीं दिखते ?”
अनिल कुमार जी ने कहा कि सरदार जी की मृत्यु हो चुकी है अब लेमन वहां नहीं बिकती।”
” पाकिस्तान से आकर रामपुर में अंटे वाली लेमन बनाना शुरू करने का कार्य क्या आपके पिताजी मनोहर लाल जी ने शुरू किया था ?”
” नहीं, हमारे पिताजी ने तो उस परंपरा को आगे बढ़ाया था। वास्तव में तो हमारे दादाजी राधेश्याम जी जब भारत विभाजन के समय पाकिस्तान से भाग कर रामपुर आए, तब यह कार्य उन्होंने शुरू किया।”
” पाकिस्तान में भी क्या अंटे वाली लेमन आपके दादाजी बनाते थे ?”
” वह हमारे परिवार का स्वर्ण युग था। हमारी वर्तमान दुहेरी दुकान से भी बड़ी दुकान पाकिस्तान में हुआ करती थी। दुकान खूब चलती थी। दादाजी अंटे वाली लेमन बनाते थे और बेचते थे। पाकिस्तान में हमारी दुकान के ठीक सामने एक स्कूल हुआ करता था। वहां के बच्चे बहुत शौक से हमारी अंटे वाली लेमन पीने आते थे। आसपास के सभी क्षेत्र के लोग दादाजी की दुकान पर अंटे वाली लेमन पिया करते थे। हमारी दुकान से ही लगभग एक किलोमीटर दूर हामिद गेट वाले सरदार जी की भी पाकिस्तान में दुकान थी। वह भी अंटे वाली लेमन बना कर बेचते थे। बहुत अच्छा वातावरण चल रहा था लेकिन सब कुछ समाप्त हो गया । फिर यहां आकर नए सिरे से कारोबार खड़ा किया। पाकिस्तान में हमारे दादाजी पच्चीस पैसे की एक लेमन बेचते थे।”
“अच्छा तो वही लेमन आज बीस रुपए की हो गई। इसका अर्थ यह भी हुआ कि यह हुनर जो अंटे वाली लेमन बनाने का है, आपको पीढ़ी दर पीढ़ी प्राप्त हुआ है। इसी हुनर के बल पर आपके दादाजी रामपुर में सफल व्यवसायी बने?”
“भाई साहब हुनर बड़ी चीज है। जिसके पास हुनर है, वह कहीं भी चला जाए अपने आप को स्थापित कर ही लेता है। ”
“अंटे वाली लेमन की बोतल वास्तव में एक हुनर रही है। यह स्थानीय कला होती है। पहले तो जो बोतल लेमन के लिए उपयोग की जाती थी, वह मोटे कांच की होती थी। अब आपने छोटी सी बोतल प्लास्टिक की बना दी है। इसका कारण क्या महंगाई है ?”
” नहीं भाई साहब, प्लास्टिक वाली बोतल देखने में छोटी जरूर है लेकिन इसमें लेमन की मात्रा पुरानी वाली कांच की बोतल से ज्यादा है । वह आकर में बड़ी थी। यह मात्रा में बड़ी है।”
” और कोई फर्क बताएंगे जो आपने लेमन के कार्य में किया हो?”
” जी, थोड़ा सा फर्क तो आया है। अब हम ग्राहक को पीने के लिए अथवा ले जाने के लिए लेमन बोतल में नहीं देते। डिस्पोजेबल ग्लास में करके लेमन ग्राहक को प्रस्तुत किया जाता है। उसमें अब हमने मसाला भी मिलाना शुरू कर दिया है। इससे स्वाद बढ़ा है, ऐसा ग्राहकों का भी मानना है।”
” यह बात तो आप सही कह रहे हैं कि डिस्पोजेबल ग्लास ज्यादा उचित है। बोतल के टूट-फूट का भी डर नहीं रहता और ग्राहक अपने घर भी लेमन आसानी से ले जा सकता है। आपकी लेमन हमें तो हमेशा अच्छी लगती है। आपके पिताजी के समय से हम इसे उपयोग में लेते रहे हैं। मगर आपके दादा जी को हमने नहीं देखा ?”
इस पर अनिल कुमार आहूजा जी ने उत्तर दिया-” उनकी मृत्यु 1960 से पहले हो गई थी। तब आप नहीं रहे होंगे ?”
” जी हां, हमारी तो अक्टूबर 1960 की पैदाइश है। लेकिन फिर भी आपके दादाजी के हुनर और संघर्षशीलता को हम प्रणाम करते हैं, जिन्होंने सदियों से पाकिस्तान में रहने के बाद भी सर्वथा विपरीत परिस्थितियों में रामपुर में आकर अपना सम्मानजनक स्थान और नाम पैदा किया। उनकी स्मृति को शत-शत प्रणाम।”
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लेखक: रवि प्रकाश
बाजार सर्राफा, रामपुर, उत्तर प्रदेश
मोबाइल 99976 15 451

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