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23 May 2024 · 1 min read

शरणागति

शरणागति

जय गिरिधारी, जय घनश्याम,
रटती हूँ मैं सुबहो शाम ।
कण-कण में रहते भगवान
कहते हैं यह वेद – पुराण ।

हर प्राणि से करती नेह
किस रूप में मिले प्रभु-स्नेह ?
बड़े भाग्य से पाई दुर्लभ देह !
किस विधि बनाऊँ प्रभु -गेह ?

उनके मिलन को तरसू हर क्षण,
तन-मन-धन करूँ मैं अर्पण ।
कब सुध लेगें, कब करेंगे वरण?
अहं त्याग उनकी ली शरण ।

– डॉ० उपासना पाण्डेय

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