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22 May 2024 · 1 min read

किलकारी भर कर सुबह हुई

किलकारी भर कर सुबह हुई
पग पग चलते हुई दोपहर,
जो शाम हुई थक कर बैठा
आ मृत्यु खड़ी हुई बेपहर।

हंसी खेल में दिन यह बीते
सुधि बिसर गयी निज निलय की ,
काल नटी कर रही हिसाब
छवि दिखा रही महाप्रलय की।

फिर भी भूल मनुज यह करता ,
मानो चला रहा वह संसार ,
सब कुछ है स्वयं संचालित
किंतु हृदय भरा है दम्भ अपार।

जीवन का घट कच्चा बहुत है
दूर-दूर तक सागर अथाह।
कैसे पार चलेंगे हम सब,
प्रत्येक दिशा से उठे कराह।

~ माधुरी महाकाश

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