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17 May 2024 · 1 min read

दोहा ग़ज़ल .....(सुगंध )

दोहा ग़ज़ल …..(सुगंध )

पावन नजरें हों अगर , पावन हों सम्बंध ।
पावन रिश्तों में बहे , पावन प्रेम सुगंध ।

जब होती हैं स्वार्थ की,आपस में तकरार ,
रेशा – रेशा प्यार का, देता है दुर्गंध ।

बहुत मधुर है प्यार की, बातों का संसार ,
जीवन भर जाती नहीं, ऐसी अद्भुत गंध ।

समझ न पाए आज तक,पावनता का अर्थ ,
पावन बंधों में बहे , मौन गंध निर्बंध ।

कितना सुन्दर हो अगर, पावन चले बयार ,
महकें मलयज गंध से, जीवन के अनुबंध ।

सुशील सरना / 17-5-24

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