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5 Jan 2024 · 4 min read

जालोर के वीर वीरमदेव

बात सन् 1293 कि है जब अलाउद्दीन खिलजी ने अपने चाचा जलालुद्दीन खिलजी का सिर धड़ से अलग कर, खुद दिल्ली की गद्दी पर बैठा। अलाउद्दीन खिलजी बहुत ही क्रूर और निर्दयी शासक था। वह शासक बनते ही भारत के सभी हिन्दू शासकों और हिन्दू मंदिरों को खत्म करने निकल गया।

सन् 1303 में रंणथम्भोर, फिर चितौड़ और फ़िर जालोर पर भयंकर आक्रमण किए।

आपने महारानी पद्मिनी कि कहानी तो सुनी होगी और आप इस बात से अंदाजा भी लगा सकते हैं कि अलाउद्दीन कि नियत बड़ी खराब थी और वह भारत के सबसे घटिया शासकों में से एक था

बात सन् 1305 कि है जब अलाउद्दीन खिलजी ने सोमनाथ मन्दिर को लुटने के लिए सौराष्ट्र पर आक्रमण करने के लिए दिल्ली से अपनी सेना भेजी इसी रास्ते में बीच में पड़ता है ‘जालौर’

जालोर राजस्थान में स्थित है यहां उस वक्त सोनगरा चौहानों का शासन था।

शासक कान्हडदेव चौहान शासन कर रहे थे जब अलाउद्दीन कि सेना ने सोमनाथ जाने के लिए कान्हड़ दे चौहान से रास्ता मांगा लेकिन कान्हड़ दे चोहान ने मना कर दिया क्योंकि वह जानते थे कि अलाउद्दीन कि नियत ठीक नहीं है इस वक्त तो अलाउद्दीन कि सेना किसी दुसरे रास्ते से निकल गई

लेकिन वापसी के वक्त जब कान्हड़ दे को पता चला कि अलाउद्दीन कि सेना सोमनाथ शिवलिंग को तोडकर साथ ले जा रही है तब कान्हड़ दे ने उस पर आक्रमण कर दिया। और शिवलिंग के टुकड़े उनसे छीन कर वापस सोमनाथ लौटा दिए।

यह बात जब अलाउद्दीन को पता चली तो उसने अपना अगला निशाना जालोर को बनाने का सोचा और फिर अपने सेनापति कमालुद्दीन को जालोर भेज दिया। कान्हड़ दे बहुत वीर और शक्तिशाली शासक था लेकिन अलाउद्दीन उस वक्त दिल्ली का शासक था और उसके पास बहुत बड़ी थी। इसी कारण कान्हड़ दे को संधी करनी पड़ी। और परिणाम स्वरूप अपन पुत्र वीरमदेव चौहान को दिल्ली दरबार भेजना पड़ा।

वीरमदेव चौहान वीर था, वीरमदेव बड़ा सुन्दर और सुडोल सुगठित शरीर था ।

अलाउद्दीन खिलजी कि लाडली पुत्री थी फिरोजा फिरोजा बड़ी सुन्दर थी और युद्ध कला में भी निपुण थी फिरोजा अलाउद्दीन कि सबसे लाडली थी अलाउद्दीन फिरोजा कि खुशी के लिए कुछ भी कर सकता था

फिरोजा को पहली नजर में ही वीरमदेव से प्यार हो गया।

फिरोजा का दिल वीरमदेव पर आ गया। फिरोजा दिनभर वीरमदेव के ख्यालों मैं खोई रहती थी और बीरमदेव का बड़ा ख्याल रखती थी। वीरमदेव को दिल्ली राजघराने में बड़ी मेहमान नवाजी करती थी।

एक दिन फिरोजा ने वीरमदेव से इज़हार कर दिया। लेकिन वीरमदेव ने प्रेम से इन्कार कर दिया।

फिरोजा इस पर बड़ी नाराज़ हुई और उसने यह बात अपने पिता अलाउद्दीन खिलजी को बताई।

दुसरे दिन अलाउद्दीन खिलजी ने वीरमदेव को दरबार में बुलाया और कहा कि फिरोजा आप से प्रेम करती हैं और वह आपसे निकाह करना चाहती हैं वीरमदेव ने मना कर दिया और कहा हमें प्रेम नही है। अलाउद्दीन खिलजी ने कहा आपके पास रातभर का वक्त है सोच समझ कर निर्णय लिजाएगा। आपका यह निर्णय आपके पुरे राजघराने को और जालोर सल्तनत को तबाह कर सकता है ।

वीरमदेव रात को दिल्ली दरबार से फरार हो गए और अपनी रियासत जालोर आ गया फिरोजा बड़ी जिद्दी थी। उसने अपने पिता अलाउद्दीन से कहा कि मुझे किसी भी हाल में वीरमदेव चाहिए। फिरोजा अलाउद्दीन कि लाडली बेटी थी और जालोर शासकों से अलाउद्दीन कि दुश्मनी भी थी

सन् 1308 में अलाउद्दीन सेना लेकर जालोर कि ओर बढ़ा। जालोर में कान्हड़ दे और अलाउद्दीन के बीच वार्ता हुई और कान्हड़दे से वीरमदेव को सौंपने कि मांग की।

कान्हडदेव बड़ा स्वाभिमानी शासक था। और वीरमदेव ने भी प्रेम से इन्कार कर दिया।

तब वीरमदेव ने कहा था

मामा लाजे भाटिया कुल लाजे चौहान
जे पर तुर्कणी, पश्चिम उगे भान

यह सत्य है कि कान्हड़ दे कि सेना छोटी थी और अलाउद्दीन कि सेना से हजार गुना छोटी भी थी लेकिन हार मानने कि जगह उन्होंने युद्ध को प्राथमिकता दी।

सन् 1311 में राजपूत क्षत्राणियो ने जोहर किया। यह राजस्थान का और चौथा ज़ोहर था जो सिवाना और जालोर किले हुआ कान्हड़ दें को रणभूमि में मंगल मृत्यु प्राप्त हुई।

अलाउद्दीन खिलजी वीरमदेव का सिर काटकर दिल्ली ले गया और फिरोजा के हाथों में थामा दिया।

फिरोजा वीरमदेव से बहुत प्रेम करती थी। अपने पिता के इस कृत्य पर बहुत दुखी हुई। विलाप किया और एक प्रेमी के लिए इस से बडी वेदना क्या होगी कि उसके प्रेमी का कटा सिर उनके हाथ में हो ।

फिरोजा ने वीरमदेव के सिर का यमुना किनारे हिन्दू रिती रिवाज से अंतिम संस्कार किया। फिरोजा यमुना में कूद कर खुदकुशी कर ली

फिरोजा का प्रेम अमर हो गया। प्रेम कहानी मुक्कमल हो गई।

सच्चे प्रेम कि जब जब कि बात कि जाएगी फिरोजा का नाम सबसे आगे होगा। प्रणाम हैं ऐसे प्रेम करने वालों को।

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