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3 Jan 2024 · 1 min read

क़रार आये इन आँखों को तिरा दर्शन ज़रूरी है

क़रार आये इन आँखों को तिरा दर्शन ज़रूरी है
रहे उल्फ़त की ये शमआ सदा रौशन ज़रूरी है

वगरना बेच खायेंगे वतन को ये सियासी लोग
क़लमकारों का आपस में हो गठबंधन ज़रूरी है

मेरे अब्बू ये कहते थे कि दौलत पर न तुम जाना
मेरे बच्चे ये कहते हैं कि पापा, धन ज़रूरी है

कभी देखा नहीं मैंने उतरती धूप का मन्ज़र
कोई छोटा सा हो घर मे मिरे आंगन ज़रूरी है

दिलों में घर बनाएगा तुम्हारा शेर भी आसी
ग़ज़ल कहने से पहले शब्द का मन्थन ज़रूरी है

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