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27 Oct 2023 · 2 min read

माई कहाँ बा

माई कहां बा–

शुवेन्दु घर पहुंचा घर वाले बड़ी उत्सुकता से उसका इंतजार कर रहे थे।
शुभेंदु जब घर मे दाखिल हुआ तो पिता रमणीक लाल ने पूछा तोहार माई कहां बा शुभेंदु बोला माई त मोटरसाइकिल के पीछे ही डॉक्टर साहब के यहां से निकली और बैठी पता नाही कहाँ रही गइल पिता रमणीक लाल ने पूछा बेटा जब माई डॉक्टर के यहां से देखाके तोहरे साथे बैठी और मोटरसाइकिल स्टार्ट किये तब पीछे वाली सीट पर बैठी रही मोटरसाइकिल कही रोके त नाही रहे ।

शुभेंदु बोला नाही हम त सीधे घरे मोटरसाइकिल रोकत हई रमणीक लाल गुस्से से बोले त माई कहाँ गइल जमीन खा गइल कि आसमान निगल गइल ।

शुभेंदु के पास पिता के इस प्रश्न का उत्तर नही था शुभेंदु के घर वाले परेशान कि आखिर शुभेंदु जब अपनी माई को डॉक्टर के यहॉ से दिखा कर मोटरसाइकिल पर साथ लेकर निकला तो मात्र शहर के एक ढेड़ किलोमीटर के रास्ते मे ऐसी कौन सी बात हो गयी कि माई अचानक गायब हो गयी रमणीक लाल को पत्नी के साथ किसी अशुभ घटना का आभास हो चुका था।
उनके आंखों में आंसू और जुबान से अकस्मात निकल पड़ा पार्वती तू कहाँ चल गाईलु अब ये उम्र में हम केकरे सहारे जिअब लड़िकन के त देखते हऊ ।

रमणीक लाल का बड़ा बेटा निर्मल बोला बाबूजी तू बात बात पर घर सर पर उठा लेत हवो हम शुभेंदु के साथ फिर वोही रास्ता से जात हई जौने रास्ते से ई आइल ह।

अब निर्मल मोटरसाइकिल चला रहा था और शुभेंदु उंसे रास्ता बता रहा था घर से लगभग एक ढेड़ किलोमीटर पर सड़क पर सड़क के बीचों बीच लोंगो की भीड़ जमा थी जो एक दूसरे से कह रही थी कैसा लापरवाह है जो इस महिला को मोटसाइकिल के पीछे बैठाकर मोटरसाइकिल चला रहा था उंसे पता ही नही चला कि उसके मोटरसाइकिल के पीछे बैठी यह बूढ़ी औरत कब गिर गयी और उबड़ खाबड़ सड़क के नुकीले कंकण उसके सर में घुस गए और वह डॉक्टर के पास भी जाने लायक नही रही दम तोड़ दिया।

निर्मल ने मोटरसाइकिल रोकी भीड़ को चीरता हुआ जब सड़क पर मृत महिला को देखा तो फुट फुट कर रोते हुए बोला माई त यहाँ मरी पड़ी बा आरे शुभेंदु भांग खाये रहा का कि तोहे पते नाही चला कि माई तोरे मोटरसाइकिल से कैसे हचका में गिर पड़ी धन्य बेटा ते बाटे ।

बात रमणीक लाल एव उनके परिवार तक पहुंची रमणीक लाल रोते बिलखते सिर्फ यही कहते पार्वती तोर जान बेटवा कि लापरवाही में चली गयी जीवन भर बेटवन खातिर आपन दिन रात हराम किया।
देख तोहे पल भर ना संभाल पाए जेके जीनगी भर संभालत रहे अब पछताए भी का होई केके दोष बा विधना के बेतवा के कि ऊबड़ खाबड़ सड़क के।।

नंदलाल मणि त्रिपाठी पीतांबर गोरखपुर उत्तर प्रदेश।।

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