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24 Oct 2023 · 1 min read

दो पल देख लूं जी भर

उजाड़ दे उलझन तू मेरा घर इस कदर,
देख भी ना सकूं फिर से कोई मंजर ।

मुझे तू कर परेशां ये तेरा हक हो सकता,
मना भी तो नहीं कर सकता तेरा सिकंदर ।

काश मैं तेरी यादों का सिलसिला बन पाता,
लेकिन निगाहों में तेरी नहीं ये मुझको मयस्सर ।

शिकबा नहीं कोई तेरा इस कदर बदल जाना,
जिंदगी के सफ़र में खलता रहेगा ये उम्र भर ।

है मुझे मालूम अंत तेरा भी और मेरा भी है,
आखिरी उम्मीद है तुझे दो पल देख लूं जी भर ।

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