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17 Oct 2023 · 4 min read

*सहायता प्राप्त विद्यालय : हानि और लाभ*

सहायता प्राप्त विद्यालय : हानि और लाभ
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सहायता प्राप्त विद्यालय की परिभाषा
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सहायता प्राप्त विद्यालय का अभिप्राय उन विद्यालयों से है, जो खोले और चलाए तो निजी प्रबंधन के अंतर्गत जा रहे थे लेकिन जिनमें वेतन वितरण की व्यवस्था सरकार ने अपने खजाने से प्रदान करने का कार्य भार ले लिया है। इन्हें अर्ध-सरकारी विद्यालय भी कहा जाता है। इन विद्यालयों में अध्यापकों और कर्मचारियों को वेतन भुगतान की सुनिश्चितता सरकार की गारंटी के साथ रहती है।
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सहायता प्राप्त विद्यालयों के लाभ: आकर्षक वेतन
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यह एक बड़ा आश्वासन होता है कि किसी अध्यापक और कर्मचारी को उसका वेतन समय से और संपूर्ण रूप से उपलब्ध हो जाएगा। वास्तव में अर्ध सरकारी विद्यालयों का यही लाभ है । इस लाभ के कारण अध्यापकों का वेतन सम्मानजनक रूप से उन्हें मिलना शुरू हुआ। अध्यापकों की जीवन शैली में सुधार आया। उनका रहन-सहन बेहतर हुआ। सबसे बड़ी बात यह रही कि अध्यापन के कार्य में सम्मानजनक वेतन मिलने के कारण अच्छी प्रतिभाऍं सहायता प्राप्त विद्यालयों में अध्यापन कार्य की ओर आकर्षित हुईं । वह विद्यार्थी जो पढ़ने में मेधावी थे, उन्होंने अपने कैरियर के रूप में सहायता प्राप्त विद्यालयों में अध्यापन-कार्य को चुना। परिणामत: अच्छी प्रतिभाऍं सहायता प्राप्त विद्यालयों को स्थाई रूप से अध्यापक के रूप में प्राप्त हुईं ।
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लगभग निःशुल्क पढ़ाई
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दूसरा इससे भी बड़ा लाभ यह हुआ कि जो बेहतरीन शिक्षा विद्यार्थियों को भारी-भरकम फीस अदा करने पर प्राप्त होती, वह अब नाम-मात्र की फीस से उन्हें प्राप्त होने लगी। विद्यालय का मुख्य खर्च अध्यापकों का वेतन ही तो होता है। जब उसकी जिम्मेदारी सरकार ने ले ली, तो बाकी खर्च नगण्य ही रह जाता है। इस तरह पढ़ने वाले विद्यार्थियों को नाम-मात्र की फीस पर बल्कि कहिए कि मुफ्त ही अच्छी शिक्षा की सुविधा सरकार के प्रयासों से प्राप्त होने लगी।
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व्यवस्था वरदान सिद्ध होती
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यह व्यवस्था वरदान सिद्ध होती और शिक्षा क्षेत्र का काया पलट हो गया होता। सरकार के खजाने से वेतन और निजी प्रबंधकों का समर्पित सेवा भाव मिलकर शिक्षा क्षेत्र में देवलोक के सुंदर वातावरण की सृष्टि कर देते।
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नौकरशाही हावी
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मगर दिक्कत यह हुई कि जब सरकार ने अपने खजाने से वेतन देना शुरू किया तो सरकारी-तंत्र को यह महसूस हुआ कि विद्यालय हमारे पैसे से चल रहा है; ऐसे में उसका प्रबंध निजी हाथों में क्यों होना चाहिए ? बस यहीं से खेल बिगड़ना शुरू हो गया। चपरासी से लेकर प्रधानाचार्य तक सब की नियुक्ति का अधिकार प्रबंधकों से छीना गया और विद्यालय में ली जाने वाली फीस का एक रुपया भी खर्च करने का अधिकार प्रबंध समिति के हाथ में नहीं रहा। नौकरशाही उत्तर प्रदेश के चार हजार से ज्यादा ऐसे विद्यालयों को अपने द्वारा संचालित करने के लिए व्यग्र थी, जिनका आजादी के बाद के प्रारंभिक दशकों में अमूल्य योगदान रहा था। नौकरशाही के प्रभुत्व ने विद्यालयों में कागजी कार्यवाही को बढ़ावा दिया और विद्यालय फाइलों के फेर में फॅंस कर रह गए।
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नए और पुराने अशासकीय विद्यालयों में भेदभाव
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विसंगति की चरम सीमा तब देखने में आई जब एक तरफ तो 1971 से पहले के विद्यालयों को सरकार ने अर्ध-सरकारीकरण के शिकंजे में ले लिया और दूसरी तरफ निजी प्रबंधन में नित्य नए विद्यालयों को फलने-फूलने की खुली छूट प्रदान कर दी। इन नए विद्यालयों के प्रबंध तंत्र को वे सारे अधिकार मिले, जो 1971 से पहले सहायता प्राप्त विद्यालयों के पास हुआ करते थे। उदाहरणार्थ नियुक्तियों का अधिकार और फीस खर्च करने का अधिकार।
1971 के बाद से लगातार बन रहे सरकारी नियमों को देखकर यही लग रहा है कि सरकार सहायता प्राप्त विद्यालयों में अपने पूर्ण नियंत्रण की दृष्टि से प्रबंधकों को मार्ग का एक अवरोध ही मानती है।
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समाज सेवा की वृत्ति हतोत्साहित
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बड़ा भारी नुकसान शिक्षा के क्षेत्र में यह हुआ कि 1947 से 1971 तक स्वतंत्रता के प्रारंभिक दशकों में जिन व्यक्तियों ने समाज-सेवा की भावना से बढ़-चढ़कर विद्यालय खोले और चलाए, उन्हें हतोत्साहन ही प्राप्त हुआ। इसे देखते हुए समाजसेवी वृत्ति से नए विद्यालय खोलने की प्रक्रिया को भारी आघात पहुंचा। जब आजादी के बाद के पच्चीस वर्षों में अच्छी मानसिकता के साथ खोले गए विद्यालयों के साथ किए गए सरकारी दुर्व्यवहार का उदाहरण सबके सामने था, तो भला इसी कार्य को कोई नया व्यक्ति अपने हाथ में क्यों लेता ? लेकिन फिर भी नए विद्यालय खुले और यह नए विद्यालय अपने स्तर पर प्रबंधन की दृष्टि से स्वतंत्र थे।
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निष्कर्ष
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1971 से पहले समाज-सेवी वृत्ति से खोले गए विद्यालयों पर तो सरकार की नियंत्रणकारी नीति अभी भी चल रही है और दूसरी तरफ 1971 के बाद खोले गए विद्यालय प्रबंध-संचालन की दृष्टि से स्वतंत्र हैं। यह भेदभाव 1971 से पहले खोले गए विद्यालयों को निश्चित ही चुभता है ।
अब सुधार का एक ही उपाय है कि सरकार सहायता प्राप्त और गैर सहायता प्राप्त विद्यालयों को मूलतः अशासकीय विद्यालय मानते हुए उनके लिए एक समान प्रबंधन व्यवस्था को लागू करने की दिशा में कार्य आरंभ करे।
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लेखक : रवि प्रकाश
बाजार सर्राफा, रामपुर, उत्तर प्रदेश
मोबाइल 9997615451

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