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5 Aug 2023 · 1 min read

फिर से तन्हा ek gazal by Vinit Singh Shayar

मैं पहले की तरह फिर से तन्हा हो गया यारो
सुबह सुबह मेरा उनसे झगड़ा हो गया यारो

घटा के बिन नहीं मुमकिन है ये बरसात कैसे हो
हमारे बीच मुहब्बत की कोई शुरुआत कैसे हो

ये दिल उम्मीद का दामन क्यों ऐसे छोड़ देती है
वो मुझको देख के मुखड़ा क्यों ऐसे मोड़ लेती हैं

मिलेगा क्या भला उनको मुझे ऐसे सता करके
बुलाती हैं मुझे खाने पे बर्तन को बजा करके

की थी एक दुआ जो जाके अब वो रंग लाई है
सुबह सुबह वो लेकर चाय मेरे पास आई हैं

~विनीत सिंह

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