*स्वस्थ देह का हमें सदा दो, हे प्रभु जी वरदान (गीत )*
रास्ते का पत्थर मात्र नहीं हूं
जैसे पतझड़ आते ही कोयले पेड़ की डालियों को छोड़कर चली जाती ह
थोड़ी सी गुफ्तगू क्या हो गई कि उन्होंने मुझे ही सरफिरा समझ ल
गरीबी
Prithvi Singh Beniwal Bishnoi
लग जा गले कि फिर ये हसीं रात हो न हो
प्रशंसा से पिघलना मत और आलोचना से उबलना मत। निस्वार्थ भाव से
प्रतिभा झोपड़ी में कैद रहती
साथ उसके इक शाम गुजरी बड़ी शिद्दत से,