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15 Jun 2023 · 1 min read

मन का वृन्दावन

प्रतिष्ठित हो –
मीरा के श्याम की तरह
मेरे मन के वृन्दावन में l

तुम्हारे आगमन की पदचाप
मोहित कर लेती है
मन – प्राणों को
मंदिर की घंटियों की तरह l

बज उठती है
साँझ की झाँझ
मन का सितार
आह्वान – आरती का संगीत l

गा उठता है कंठ मधुर
सु – स्वागतम का कोई गीत
पाकर सुपरिचित
मन का मीत l

और बिना जलाएं
अगर की बत्तीयां
फ़ैल जाती है सर्वत्र
गंध -सुगंध- इत्र l

भर जाता है
मेरा रीता मन
जीवन लगता है
जैसे नवनीत l

प्रतिष्ठित हो –
मीरा के श्याम की तरह
मन के वृन्दावन में.
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
@रचना – घनश्याम पोद्दार
मुंगेर

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