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15 Jun 2023 · 2 min read

माता सति की विवशता

चले अगस्त्य मुनि आश्रम से जब सति सहित कृपाल,
ध्यानमग्न श्रीराम के लोचन सजल विशाल। (१)

पहुंचे दण्डक वन गहन जहाँ ना नर ना नारी,
तभी उन्हें आते दिखे अनुज सहित श्री खरारी।(२)

खोज रहे थे सीय को रो रोकर दो भ्रात,
रावण हर ले गया था उनको अपने साथ। (३)

तुरंत वृक्ष की ओट ले सति को किया संकेत,
छुप जाओ ना देख लें हमको कृपानिकेत। (४)

शङ्कर तो सर्वज्ञ हैं उनसे छिपा है क्या,
रावण मर्दन के लिए हरि ने खेल रचा। (५)

नाटक सारा चल रहा सूत्रधार श्रीराम,
ऐसा ना हो बीच में ही रुक जाए काम। (६)

छिपकर जगत के नाथ ने झुककर किया प्रणाम,
मन ही मन में मिल लिए विश्वनाथ श्रीराम। (७)

राम के शङ्कर इष्ट हैं शङ्कर के श्रीराम,
दोनों पूरक एक दूजे के जैसे सुबहा शाम। (८)

सति रहीं संदेहवश “चाहते क्या गौराङ्ग?,
इनको क्यों ये कर रहे वन्दन यूं साष्टाङ्ग।” (९)

सति तो बस निज धर्म रत पति को माने ईश,
जिनको आ सब देव दनुज किन्नर नाते शीश। (१०)

दो भाई तन से मलिन मन से अति उदास,
सति को तो ना दीखता उनमें कुछ भी ख़ास। (११)

बोलीं “प्रभु! मम नाथ प्रिय ये क्या करते आप?,
आपके ऐसा करने से मुझको बड़ा सन्ताप। (१२)

इस सारे ब्रह्माण्ड में आपसे बड़ा है कौन?”,
बोले धीरे से प्रभु जो थे अब तक मौन। (१३)

“देवी ये परब्रह्म हैं और मेरे आराध्य ,
नर तन धर लीला करें हों भावी के बाध्य। (१४)

देवी आप ना करें तनिक भी इन पर सन्देह,
माया रूप सिया जी हैं जिनके पिता विदेह।” (१५)

शङ्करजी ने चरित पर डाला सकल प्रकाश,
सति को फिर भी ना हुआ उन पर कोई विश्वास। (१६)

“मैं कैसे मानूँ भला आपने कहा है जो,
मैं तो खुद से परखूँगी क्या भगवान् हैं वो।”(१७)

शङ्करजी को दिख गया हठधर्मी है नार,
भावी प्रबल सबल परम होगा जो होनहार। (१८)

“जैसी इच्छा हो प्रिये करो जो तुम मन ठानो,
अंतिम बार पुनः कहूं, मेरा कहना मानो। (१९)

भूल करोगी जो करा इनसे कोई छल,
नाटक की पौशाक हैं जटा जूट वरकल।”(२०)

आगे कथा विदित ही है जब धरी सीता वेश,
मायापति की माया से पहुंचा बड़ा कलेश। (२१)

प्रश्न ये मन में आता है क्या मैया थीं भोली?,
जो शङ्कर की वल्लभा उनकी क्यों मति डोली। (२२)

उत्तर ये मैंने सुना एक बार की बात,
रामायण मर्मज्ञ संत ने कहा मोहे समझात। (२३)

देखो जैसे बाल कोई नन्हा चलना चाहे,
उसकी माता हाथ पकड़ उलटा चलके दिखाए। (२४)

क्या वो माता “जड़मति” चलना भी ना जाने,
पर जो बाल अबोध हैं हो जाएं सयाने। (२५)

।। श्रीसीतारामचन्द्रार्पणमस्तु ।।

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