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14 Jun 2023 · 1 min read

सपने सारे टूट चुके हैं ।

सपने सारे टूट चुके हैं ।
हाथ-हाथ से छूट चुके हैं ।
भटक रहे हैं प्राण अकेले –
घट माटी के फूट चुके हैं ।।

✍️ अरविन्द “महम्मदाबादी”

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