Sahityapedia
Sign in
Home
Your Posts
QuoteWriter
Account
14 Jun 2023 · 1 min read

गर्मियों की छुट्टी

गर्मियों की छुट्टी!

कड़कती धूप और हाथ में आम का जूस,
थाल लगाकर बैठेते थे, सब खाने को तरबूज।

जमीन से निकलते थे, भभकते शोले,
और हाथ में होते थे, रंग बिरंगे बर्फ के गोले ।

लूडो, कैरम और सांप सीढ़ी,
संगी साथी खेलते ताश और चौकड़ी |

कोई सोता था कूलर के सामने बिछाकर अपनी दरी,
तो कोई बैठता पढ़ने,बांकेलाल, बिल्लू, पिंकी और चाचा चौधरी |

हर घर में होता था हो-हल्ला,
किसी बगीचे में खेलता था, सतोलिया पूरा मोहल्ला |

कोई जाता था, रेल गाड़ी से नानी के यहां,
और मिलते थे सारे ममेरे यार वहां |

खूब खिलता था छूप्मम – छुपाई, बर्फ पानी और पकड़म पकड़ाई,
और, कई बार तो इसी बीच हो जाती थी, यारों से मार पिटाई |

खेलते थे उतना, जैसे खोद के आये हो माइन,
नहाकर कर लगाते थे, आइसक्रीम के लिए लाइन।

जाता था कोई सीखने नाच या गाना ,
और, किसी तो चाहिए था बस खेल का बहाना।

इमली, पेप्सी- कोला लिए ,दोस्तों के साथ होता था गाना बजाना,
कुछ तो बैठते थे टीवी के सामने,कार्टून शो, देखने रोजाना।

शाम को छत पर पानी डालना, और, फुव्वारे के नीचे नहाना,
यही तो था सन्न ९० की गर्मियों का जमाना |

उलझते थे मांजे, पतंगे थी कटतीं,
और, घर घर में मटका कुल्फी थी बंटती |

चलता था दिन भर कभी कट्टी कभी बट्टी,
ऐसी थी हमारी गर्मियों की छुट्टी |

Loading...