Sahityapedia
Sign in
Home
Your Posts
QuoteWriter
Account
13 Jun 2023 · 1 min read

नया मानव को होता दिख रहा है कुछ न कुछ हर दिन।

ग़ज़ल

1222/1222/1222/1222
नया मानव को होता दिख रहा है कुछ न कुछ हर दिन।
जहां में घट रहा अच्छा-बुरा है कुछ न कुछ हर दिन।1

ज़रूरत भर को मालिक दे रहा है ख़ुद ब ख़ुद सबको,
यहाॅं इंसान फिर भी मांगता है कुछ न कुछ हर दिन।2

यहाॅं हर शख़्स नफ़रत बांटता है आज दुनियां में,
मगर बस प्यार मां ने ही दिया है कुछ न कुछ हर दिन।3

सतत महनत से ही मिलता है फल जो चाहते हैं सब,
वही पाया है मंजिल जो चला है कुछ न कुछ हर दिन।4

मुझे प्रेमी ने दी थी जो कली इक प्यार में तोहफा,
वो तोहफा फूल बनकर खिल रहा है कुछ न कुछ हर दिन।5

………✍️ सत्य कुमार प्रेमी

Loading...