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13 Jun 2023 · 1 min read

सदियाँ लगीं संभलने में

सदियाँ लगीं संभलने में
दिल का ज़ख़्म भरने में

हाथ समुन्दर का ही है
नदियों को खाली करने में

मेरे पाँव नहीं थकते
उनकी गलियों में चलने में

सोलह बरस लगेंगे भँवरे
कलियों को फूल बनने में

हमको अज़िय्यत हुई ‘धरा’
वो तो माहिर थे बदलने में

त्रिशिका श्रीवास्तव धरा
कानपुर (उत्तर प्रदेश)

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