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12 Jun 2023 · 1 min read

काश

वो माँग रहा था कुछ

हाथ फैला कर

मुंह फेर लिया तुमने भी

द्वितीय ईश्वर हो कर

उलझ कर रह गई इच्छाएं

रेशमी रिबन के साँप के जैसी

उसके झोली मैं थी

एक शून्यता और

भुख एक मुठ्ठी

झोली के भीतर

हाथ डाल दिया उसने

झूठी कोशिश, निकालने की

कुछ मुहूर्त, भूख से तड़पते

उसके बेटे का विलाप

झांकती हुई मजबूरी,

उसकी स्त्री के

उन्मुक्त स्तन,फटी हुई साड़ी से

काश! मैं होता एक रुपया

होता उसके झोली में

महसूस करता वो शुन्यता

अंधेरे के भारीपन में

किंतु मैं था मेरे अंदर

और थी उसकी झोली में

केवल एक शून्यता और

भुख एक मुठ्ठी, भुख एक मुठ्ठी |

पारमिता षड़ंगी।

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