Sahityapedia
Sign in
Home
Your Posts
QuoteWriter
Account
12 Jun 2023 · 1 min read

जहन मे सौ सौ बार आया था वो

जहन मे सौ सौ बार आया था वो
हर बार मगर लगता साया था वो

उसे दिल में बसा रखा है अभी भी
किस मुँह से कहोगे पराया था वो

फिर भी वजूद में रहा मेरे मालिक
न जाने कितनों ने मिटाया था वो

बिखरा हुआ था काटों के दरमियाँ
मुहब्बत से चुनकर उठाया था वो

आज धूप में जलता है फुटपाथ पे
कभी मां ने छांव में सुलाया था वो

अंधेरे घरों के खातिर मुश्किल से
कुछ उजाले मांगकर लाया था वो

राख के ढेर ये कह रहे हैं “आलम”
जलाकर किसी ने बुझाया था वो
मारूफ आलम

Loading...