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11 Jun 2023 · 1 min read

पथराई आँखें

अंधेरों को तलाशा करती आँखें,
उजालों से वो पथरा-सी गई हैं।

कहे दीवाना चाहें उसको कोई,
इश्क से अब वो घबरा-सी गई हैं

मुहब्बत रास कब आती किसी को,
इसे सच जान इठला-सी गई हैं।

ना कोई ठौर, ना कोई ठिकाना,
बंजारा बन वो इतरा-सी गई हैं।

साथी कौन किसका कब रहा है,
तन्हाई अब है साथी, जतला-सी गई है।

साथ कब देती परछाई भला, सुन
तम के साए से वो शरमा-सी गई हैं।

जगी आँखों से रेलमपेल जग का,
इस जहाँ से रुलाई-सी गई हैं।

जो नज़रे चार होने को थी पल में
वही नज़रे चुराई-सी गई हैं।

‘इन्दु’ लेकर उधारी रोशनी की,
लुटा के खुद को, बिखरा-सी गई हैं।
इन्दु
इन्दु

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