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25 Apr 2023 · 1 min read

सचमुच सपेरा है

नफ़रतों को बीन से जिसने बिखेरा है
आदमी अब हो गया सचमुच सपेरा है

रोशनी से जगमगा कोठी रही फिर भी
ढो रहा दिल में घना वह तो अँधेरा है

शोर पैदा शब्दों में कर ले सुनेंगे सब
मत कहे कोई ये शब्द का लुटेरा है

जोड़ता ही जा रहा अब वक्त को वो यूँ
लाद गठरी पीठ पर जैसे ठठेरा है

दर्द अब दिल का नहीं सबको दिखा सकता
चित्र में ही (सुधा) दर्द अपना वह उकेरा है

डा. सुनीता सिंह ‘सुधा’
24/4/2023
वाराणसी,©®

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