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9 Apr 2023 · 1 min read

नवगीत

बदल गए है सब प्रतिमान

अस्ताचल में सच का सूरज
हुआ झूठ का नवल विहान,

त्याज्य हुआ पंचामृत पोषक
मैला लगता गंगा नीर,
तीर्थाटन है सैर-सपाटा
घूम-घूम खींचें तस्वीर।

नागफनी की पूजा होती
तुलसी झेल रही अपमान।

हाय-बाय पर हम आ पहुँचे
बंद नमस्ते और प्रणाम,
सिसक रहा है दौर दुखी हो
फैशन के कारण बदनाम।

अंग-अंग जिनमें से झाँके
पहन रहे ऐसे परिधान।

नज़रें झुका उँगलियाँ चलतीं
मोबाइल सब पकड़े हाथ,
पास-पास ही रहते हैं सब
कोई नहीं किसी के साथ।

मौन व्रती बन बैठा है घर,
मरघट-सा लगता सुनसान।
डाॅ बिपिन पाण्डेय

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