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5 Apr 2023 · 1 min read

आग उगलती मेरी क़लम

आग उगलती मेरी क़लम
राज़ खोलती मेरी क़लम
तख्त उलटती मेरी क़लम
ताज पलटती मेरी कलम…
(१)
अगर मंसूर का वंशज तो
मैं वारिस हूं कबीर का
सदियों से क़ौमी ज़ेहन के
दाग़ निगलती मेरी क़लम…
(२)
इश्क़ से इंकलाब तक
दायरा है मेरे फ़न का
अपनी नज़्मों और गीतों से
समाज बदलती मेरी कलाम…
(३)
तू ठहरा दरबारी गायक
लेकिन मैं अवामी शायर
तेरी-मेरी कैसे निभेगी
झाग उगलती तेरी क़लम…

#Geetkar
Shekhar Chandra Mitra
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