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3 Apr 2023 · 1 min read

आदिम परंपराएं

आधे जागे तो आधे
सोए जा रहे हम!
तो भी अपनी दुर्दशा पर
रोए जा रहे हम!
न जाने शर्म क्यों हमें
ज़रा भी नहीं आती!
वही आदिम परंपराएं
ढोए जा रहे हम!
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