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1 Apr 2023 · 1 min read

हसरतें हर रोज मरती रहीं,अपने ही गाँव में ,

हसरतें हर रोज मरती रहीं,अपने ही गाँव में ,
आस लिये थी बैठने की पीपल की छाँव में ।
स्वप्न विश्रांति पा चुके कब के पौंछ के आँसू
जाने कब पड़ाव आ गया कातिलों के गाँव में।।
पाखी_मिहिरा

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