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26 Mar 2023 · 1 min read

अपना तो ये ही स्वारथ है

अपना तो ये ही स्वारध है

शायद फिर कोई आया है
इस मकान के अंदर रहने ।
पहले से ही यहाँ पड़े है
अनछुये कपड़े और गहने ।

कोई भी हो, अतिथि देव सा
प्यार भरा सत्कार करेंगे ।
अनजाने में हुई भूल को
आशा है वे माफ करेंगे ।

देव-देवि आशीष मिले तो
पथ की बाधाये‌ मिट जातीं ।
भले लक्ष्मी आये नहीं पर
सरस्वती तो निश्चित आतीं ।

साहित्यिक मित्रों की खातिर
खुले रखेंगे द्वार बाहरी ।
जहां जुड़ेगी लिखा पढ़ी की
सदाचार की बात हमारी ।

आने वाले हर वर्ष मे
सभी आगतों का स्वागत है ।
यह मकान मंदिर बन जाये
अपना तो ये ही स्वारथ है ।

लक्ष्मी नारायण गुप्त

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