मुक्तक
ज़िंदगी तब महान लगती है
जब तुम्हारी दुकान लगती है
पान खाने जो आऊँ तो तेरी
आँख ये मेज़बान लगती है
प्रीतम श्रावस्तवी
ज़िंदगी तब महान लगती है
जब तुम्हारी दुकान लगती है
पान खाने जो आऊँ तो तेरी
आँख ये मेज़बान लगती है
प्रीतम श्रावस्तवी