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23 Feb 2023 · 1 min read

चिंता और चिंतन

मुक्तामणि छंद

चिंता की चिंगारियाँ,मन को नित सुलगाएँ।
चिंता की हर गाँठ को,कब तक हम सुलझाएँ ?
बिन जल ही फूले-फले,चिंता की फुलवारी।
चंचल मन हर पल करे,चिंताओं से यारी।

संत कहें चिंता नहीं,चिंतन से कर यारी।
कथा-श्रवण सत्संग से,धीरज मिलता भारी।
चालीसा-हनुमान का,पाठ करो नित मन से।
हर लेंगें हनुमान जी,हर चिंता चित-मन से।

ललित किशोर ‘ललित’

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