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11 Feb 2023 · 4 min read

शिवकुमार बिलगरामी के बेहतरीन शे'र

न तो अक्स हूं न वजूद हूं मैं तो जश्न हूं किसी रूह का
मुझे आईनों में न देख तू मुझे ख़ुशबुओं में तलाश कर

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कई बरसों से तेरा मुंतज़र बैठा है चौखट पर
न ले मेरी ख़बर लेकिन मुझे अपनी ख़बर तो दे

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एक बेनाम सा रिश्ता है अभी तक तुमसे
इस हक़ीक़त को छुपायें तो छुपायें कैसे

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मेरी ज़बान में ऐसा तिलिस्म हो कोई
जिसे हसीन कहूं वो हसीन हो जाए

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बाद उसके मुझे कोई न जंचा
मैंने हर एक से तौबा कर ली

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तुम्हारी ख़ुशनुमा यादें मेरे दिल में बसी हैं यूं
कि जैसे सीप में मोती कि जैसे फूल में ख़ुशबू

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वतन परस्ती तुझ में भी है वतन परस्ती मुझ में भी है
फ़र्क मगर बस इतना सा है मैं भारत को मां कहता हूं

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जो कभी तुमको भुलाऊं न भुलाया जाये
नये फूलों से वही ख़ुशबू पुरानी आये

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तुम मेरे साथ कोई दिन ये सियासत भी करो
मुझसे नफ़रत भी करो मुझसे मोहब्बत भी करो

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आपके दिल की अदालत में मुक़दमा है मेरा
मेरे मुंसिफ़ भी रहो अपनी वक़ालत भी करो

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इस मुहब्बत के तक़ाज़े भी हैं कैसे कैसे
सीधे सादे भी दिखो और शरारत भी करो

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अगर सच जानना है तो किसी बेख़ौफ़ से पूछो
सिपाही कब बताता है सिपहसालार कैसा है

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नींद की गोली न खाओ नींद लाने के लिए
कौन आएगा भला तुमको जगाने के लिए

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हमदर्द कैसे-कैसे हमको सता रहे हैं
कांटो की नोक से जो मरहम लगा रहे हैं

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हंसते रहते हो ग़म ओ रंज छुपाने के लिए
तुम भी क्या ख़ूब पहेली हो ज़माने के लिए

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बरसों पनाह दी है मैंने जिसे निगाहों में
वो बेवफ़ा मिली मुझे दूसरों की बाहों में

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किसलिए दिल को यूं ग़मगीन किये बैठे हो
किस से नाराज़ हो क्यों होंठ सिये बैठे हो

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किसी के दिल में बसा है न घर में रहता हूं
मैं सुब्ह शाम मुसलसल सफ़र में रहता हूं

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मुझे पसन्द हैं गुमनामियां मगर यूं ही
तेरी ख़ुशी के लिए मैं ख़बर में रहता हूं

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न मेरी आंख ही फड़की न मुझको हिचकियां आईं
मगर फिर भी ये लगता है कि कोई याद करता है

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बात करने का सलीक़ा मैंने पाया जिसमें
इक वही शख़्स मुझे शहर में ख़ामोश मिला

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जिनके साए में गुनहगार खड़े होते हैं
वो कभी भी न बड़े थे न बड़े होते हैं

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अपनी मंज़िल के लिए राह न तुम पाओगे
दिल में नफ़रत जो रखोगे तो भटक जाओगे

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तू न बन मेरा मददगार न बन
पर सितमगर का तरफ़दार न बन

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बताओ हिज्र के लम्हों में कैसे घुट के मर जाऊं
सितम की चाह बाक़ी है अभी महबूब के दिल में

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जुनूं की इन्तेहा है यह कि कोई बेशऊरी है
मैं रोज़ आवाज़ देता हूं उसे जो सुन नहीं सकता

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दुश्मनों को दोस्ती का हर घड़ी पैग़ाम दो
इक तरीक़ा यह भी है उनको सताने के लिए

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इसलिए धूप ज़रूरी है सभी के सर पर
लोग साये को कहीं क़द न समझ लें अपना

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हथेली वक़्त से पहले मसल देती है हर आंसू
हमारी आंख के आंसू कभी मोती नहीं बनते

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किसने वार सहे हैं सबके
किसने सबको मुआफ़ किया
जिस्म जिगर जां ज़ख्मी पाकर
कौन दिलावर मुस्काया

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ज़रा सा वक़्त तो दे ज़िन्दगी मुझको संभलने का
बुरा हो वक़्त तो कुछ वक़्त लगता है संभलने में

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मुहब्बत में तुझे ऐ दिल ! हदों से अब गुज़रना है
सज़ा तेरी मुक़र्रर है तुझे बस जुर्म करना है

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मुझको डर है कि कभी तुम भी बदल जाओगे
मुझको देखोगे तो चुपचाप निकल जाओगे

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घर उजड़ने का न दिल में मलाल तुम रखना
दूर जाते हो तो अपना ख़याल तुम रखना

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किसी के साथ चले भी तो फासला रक्खा
सफ़र में सबके लिए हमने रास्ता रक्खा

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ख़ुदा करे कि तुझे अब मेरी ख़बर न मिले
मेरी नज़र से कभी अब तेरी नज़र न मिले

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तुम्हें बादल दिखाएगा तुम्हारे वोट ले लेगा
मगर कोई सियासतदां तुम्हें बारिश नहीं देगा

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दुआ लबों पे तो आंखों में बन्दगी रखना
नये अमीर हो तुम ख़ुद को आदमी रखना

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अपनों से न ग़ैरों से कोई भी गिला रखना
आंखों को खुला रखना होठों को सिला रखना

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सुनते थे हर किसी से हम अफ़साने दर्द के
अच्छा हुआ कि दर्द से पहिचान हो गई

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सामने आ के मेरे जुर्म गिनाओ तो सही
मैं गुनहगार तुम्हारा हूं बताओ तो सही

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मेरी नज़र को कोई क़ायदा जंचा ही नहीं
नज़र में सिर्फ मोहब्बत का क़ायदा रक्खा

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तुम मेरे साथ कोई दिन यह सियासत भी करो
मुझसे नफ़रत भी करो मुझसे मोहब्बत भी करो

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इनके धूएं से तेरे ताक़ तो काले होंगे
पर चरागों को जलाने से उजाले होंगे

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कभी जब गांव जाता हूं तो बचपन ढूंढता हूं मैं
नए घर में पुराने घर का आंगन ढूंढता हूं मैं

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हर हक़ीक़त को यहां अब मुंह छुपा कर देखिए
धूप को भी धूप का चश्मा लगा कर देखिए

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अपनी आंखों पे मुझे ख़ुद भी भरोसा न हुआ
मैंने मुड़ मुड़ के अमीरों की ग़रीबी देखी

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जानता हूं कि मेरी उम्र बहुत थोड़ी है
फिर भी एक शाम तुम्हारे लिए रख छोड़ी है

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फिर कभी तुमको बुलाऊं तो फिर आये न बने
बात इतनी न बिगाड़ो कि बनाये न बने

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चोंच से सहला रहे हैं जो परों को
वो परिन्दे छोड़ जाएंगे घरों को
दूर जाकर ये न जाने क्या करेंगे
कौन देगा बादशाहत नौकरों को

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