*तन तो बूढ़ा हो गया, जिह्वा अभी जवान (आठ दोहे)*
तन तो बूढ़ा हो गया, जिह्वा अभी जवान (आठ दोहे)
_________________________
1
तन तो बूढ़ा हो गया, जिह्वा अभी जवान।
रचा न जाने किस तरह, ईश्वर ने इंसान।।
2
आत्मा का किसको पता, देखा कब भगवान।
तन के भीतर झॉंकते, कैसे सब अनजान।।
3
जन्म-मरण का चल रहा, जाने कब से चक्र।
सीधी अब तक कब हुई, दृष्टि ईश की वक्र।।
4
वृद्धावस्था अंत है, बचपन है शुरुआत।
यौवन में है नौकरी, शुभ-विवाह की बात।।
5
जो चाहा वह कब मिला, सबको रहा मलाल।
एक अधूरापन रहा, दिखे भले खुशहाल।।
6
निश्छलता जिसको मिली, उसे मिली सौगात।
बिना यत्न ही मिल गए, ईश्वर भी साक्षात।।
7
आत्म-दीप जो बन गया, देखा अंदर झॉंक।
उसकी कीमत यह जगत्, पाया कब है ऑंक।।
8
धन से कब मिलते भला, निराकार भगवान।
हृदय कमल में ढूॅंढना, निर्धन को आसान।।
_________________________
रचयिता : रवि प्रकाश
बाजार सर्राफा (निकट मिस्टन गंज), रामपुर, उत्तर प्रदेश
मोबाइल 99976 15451