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9 Feb 2023 · 1 min read

नासाज़ ऐ-दिल

बड़ा नासाज़-नासाज़ सा
क्यों है ऐ-दिल,
जो कहना है खुल के
कह दे आज ऐ-दिल।

हो जाती है गुफ्तगू
अनायास ही ना चाहते हुए भी,
कर इक बार कोशिश फिर से
नाराज़ ऐ-दिल।

आसान नहीं है फिर से
टूटी कश्ती को जोड़ना,
जो बन जाये बात तो
अदभुत काज है ऐ-दिल।

राह बन जाएगी बस
एक कदम बढ़ाने की देर है,
मिल जाएगी वो मंजिल भी
कर तो आगाज़ ऐ-दिल।

कुछ नही बस
धुआं धुंआ सा है,
नज़र आ जायेगा
फिर वही मंजर,
बस कर तो इक बार
नज़र अंदाज ऐ-दिल।

कुमार दीपक “मणि”
08/02/2023

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