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6 Feb 2023 · 1 min read

क्या मैं थी

क्या मैं थी,और क्या हो गई हूं।
लगता है मुझे, कहीं खो गई हूं।

बहुत बदल गया , मुझको ये सफर।
अजनबी सा लगे,अपना ही घर।

ज़िंदगी दिखा गई,मुझे ऐसे रंग ढंग।
आज़िज होकर इससे, मैं हुई हूं तंग।

खुदा बदले बहुत ,दुआ हुई न कबूल।
तुमसे इश्क करना,मेरी फक्त थी भूल।

लौट आओ,राह तकते हैं नैना।
आंख बरसे और कटे न रैना।

सुरिंदर कौर

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