Sahityapedia
Sign in
Home
Your Posts
QuoteWriter
Account
7 Nov 2022 · 1 min read

लौट आये पिता

देखा एक अनोखा सपना
पाई वो सुखद छाया सी
घर आँगन के हर कोने में
अपनों के संग दिखलाये पिता

आभास था कितना सुखद वो
फिर से घर लौट आये पिता

पाया खुद को अब सुरक्षित सा
जब हाथ सिर पर उन्होंने रखा
होकर बेफिक्र सी मुस्कुराई
आसमां बनके छाए पिता

उत्सव का वातावरण ऐसा
कभी कहकहे हँसी ठहाके
कहीं नाराजी शब्द अनोखे
अम्मा की मुस्कान लाये पिता

थमी सी ज़िंदगी अचानक ही
चलती हुई आज दिखलाई
तनकर इक विशाल वृक्ष से
छाया देते दिखलाये पिता

लग गए ताले कुछ मुखों पे
रौब से बैठे दिखलाये पिता

आँख खुली तो भीगे थे नैना
सुना था अब घर वो सारा
ना कहीं फिर नज़र आये पिता।।

✍️”कविता चौहान”
स्वरचित एवं मौलिक

Loading...