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21 Oct 2022 · 1 min read

आस का दीपक

कुछ रिश्ते थे जो टूट गये
कुछ साथ थे जो छूट गये
अब हो खुशियों का मेला
ये दिल रहता तनहा अकेला
सूनेपन की चादर ओढ़ कर
घर सोता है मुँह मोड़ कर
आँगन जाने कब से रूठा है
चौखट पर इंतज़ार बैठा है

आले में दीपक टिमटिमाता
आस की लौ उर में जगाता
छूट गए जो मिल जाएँगे
उधड़े रिश्ते सिल जाएँगे
बस थोड़ा सा धीरज धरना
सूरज का निश्चित निकलना
आँगन में फिर धूप खिलेगी
ख़ुशियाँ आज नही तो कल मिलेंगी

रेखांकन|रेखा

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