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13 May 2022 · 1 min read

वेदना

जिस्म तो यही रहा साँसें चलती गयी
तुम्हारी कमी अन्तस तक तोड़ती गयी

रात के सन्नाटे में तन्हाई शोर मचाती गयी
बनकर अश्रु आँखों के कोरों से छलकती गयी

सूनसान वीरान राहों पर तन्हा चलती गयी
समाज के तानों से पल पल खुद मरती गयी

खुशियाँ सारी रूठ गयी मौन व्यथा बनती गयी
साँसों का बस बोझ रहा जीवन अपना ढोती गयी

भूल गयी मैं जिन्दादिली, बेफिक्री क्या होती थी
जीती जाती इंसान , मूरत सी बनती गयी

एक एक रोटी प्रेम की विष रूप में ढल गयी
मखमली बिस्तर भी अंगारों सी तपिश देती गयी

पग पग बिछे काँटों से हृदय को छलनी करती गयी
नमक मले गए जख़्मो पर मैं मरहम खोजती गयी

-अर्चना शुक्ला”अभिधा”

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